पौराणिक इतिहास



गौरव

एक हज़ार वर्ष पूर्व नाबरिया गौत्र (बरनेला तिवाड़ी) के पूर्वज वन्डेलपुरा गांव से नाबरा आकर बसे। पूर्वज श्रीमान नाडोजी ने कंटालिया गांव में 88,000 ऋषियों को भोजन कराया और पूर्वजो से राव जी को सिंह दान दिया ।

कथा

बुजुर्ग लोग बताते है राजा महाराजओ की रियासते थी उस समय वहाँ नाबरा गांव बसा हुआ था। जो आज भी छोटी ढ़ाणी के रूप नाबरा नाम से आबाद है। प्राचीनकाल में ब्राह्मण यहाँ भैरूजी की पूजा करते थे। उस समय एक मुगल राजा.......................नाबरा गांव से निकल राजा था कि उसकी नजर ब्राह्मण कन्या पर पड़ी उसने उसे दरबार में भेजने का आदेष दिया। इस पर नाबरा में निवास करने वाले ब्राह्मण भैरूजी मन्दिर गये और व्यथा बताई। इस पर भैरूजी ने रात के समय सभी ब्राह्मण को उनके पीछे आने का आदेष दिया और पीछे नही मुड़ने की बात कही। ब्राह्मणो ने ठीक वैसा ही किया जैसे ही समाज के लोग गांव से बाहर निकले पीछे पूरा गांव लुप्त हो गया। किवदंती है कि भैरूजी माण्डा गांव में जाकर बसे जहाँ आज उनके आस-पास के क्षे़त्रों में नाबरिया गुर्जरगौड़ समाज के लोग बसे हुए है।

उत्पति

नाबरियों के ऋषि त्रिपर्वा (कष्यप, वषिष्ट, मान ऋषि), बारह गौत्र में नाबरिया कष्यप गौत्र है। तथा चार वेदो में युर्जुर वेद है तथा शाखा मिथुनी व शाखा गुरू वृहस्पिति हैं एवं वंष जयदेव व देव शाकलराम जी है।

खोज

ऐतिहासिक जानकारी के दौरान वयोवृद्ध श्री देवीलाल जी राव निवासी-सांवलता, श्री सुखदेव आत्मज श्री बद्रीनारायण जी नाबरिया, निवासी-रामासनी से मिली वृहत जानकारी के पश्चात निष्चित स्थान की खोज शुरू हुई। सूत्र हाथ लगते ही समाज के अग्रगण्य महानुभावों ने जिसमे .................................शामिल हुए खोजते खोजते नाबरा गांव पहुँचे जहाँ गड़रिये के द्धारा पता चला कि यहाँ एक मुर्ति स्थापित थी जो आज भी पहाड़ी पर है जिसमें देवलिपि में वर्णन है। इस तरह खोज संभव हुई। तत्पष्चात् कुलदेवी व देवालय का स्थान निष्चित किया गया। देष देषांतर तक संदेष पहुंचाये गये तथा अन्ततोगत्वा आज हमारी आदि जन्म स्थली पर भव्य देवालय में अधिष्ठात्री कुलदेवी पंडुका भंवाय माताजी के दर्षन पाकर जीवन धन्य कर रहे है।

स्थानिय सोन्दर्य

अरावली की पहाड़ियों की तलहटी में स्थित धारेष्वर महादेव मन्दिर के समीप ही प्राचीन भंवाय माताजी का मन्दिर डुंगरी (पहाड़ी) पर स्थित है। मन्दिर के सामने ही कल कल करती नदी प्रवाहित होती है जो धारेष्वर महादेव जी मन्दिर के झरनों से बहने वाला पानी साल भर चलता रहता है चारो और अरावली पहाड़ियों व वन से गिरा होने के कारण हरियाली ही हरियाली नजर आती है।

पूजा व जागरण

कुलदेवी की पूजा व जागरण हर वर्ष की चैत्र सुदी आठम को जागरण और नवमीं को महाआरती व पूजा कर प्रसाद का भोग लगाया जाता है। (पूजा करते समय घंटी बजाना अनिवार्य है।)